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पाल्मर और राइस सहित पांच खिलाड़ियों की वापसी ने टुखेल को और भी असहज स्थिति में डाल दिया

The Telegraph के अनुसार, इंग्लैंड कैंप से पांच प्रमुख खिलाड़ियों की वापसी थॉमस टुखेल के लिए हर लिहाज से अशुभ संकेत है।

डेक्लान राइस, कोल पाल्मर, कोबी मेनू, मार्कस रैशफोर्ड और टिनो लिवरामेंटो ने हाल ही में थ्री लायंस की टीम से नाम वापस ले लिया है, जिससे टुखेल द्वारा गढ़ी गई कथित “भाईचारे” की छवि पर कड़ी रोशनी पड़ गई है। हालांकि हर मामले की अलग से जांच की जा सकती है—और इंग्लैंड के मेडिकल स्टाफ ने शारीरिक चिंताओं का हवाला देते हुए सभी खिलाड़ियों की अनुपस्थिति को आधिकारिक मंजूरी भी दी—लेकिन राइस और पाल्मर के लिए कारण के तौर पर “वर्कलोड मैनेजमेंट” का सामने आना कई सवाल खड़े करता है। पाल्मर को गर्मियों में पूरा आराम मिला था, फिर भी चेल्सी का तर्क था कि सीज़न की उनकी तेज़ शुरुआत को देखते हुए एहतियाती सावधानी ज़रूरी थी। लेकिन पाल्मर को अब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मज़बूत करनी है, ऐसे में तीन हफ्तों के लंबे कैंप में होने वाले सभी चार मुकाबलों से बाहर रहना कुछ ज़्यादा ही लगता है।

यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय मैनेजरों और क्लबों के मेडिकल विभागों के बीच बढ़ते तनाव को उजागर करता है—एक ऐसा टकराव जो पिछले सीज़न में चेल्सी के भीतर हुए उस आंतरिक विवाद की याद दिलाता है, जिसके बाद एंज़ो मारेस्का का क्लब से जाना तय हुआ था। टुखेल इससे बिल्कुल खुश नहीं हो सकते। यह स्थिति असहज सवाल खड़े करती है: क्या ये फिटनेस चिंताएं सप्ताहांत के बाद अचानक सामने आईं, या आराम की ज़रूरत पहले से ही पता थी? क्या क्लबों की तरफ से संचार पर्याप्त था? स्वाभाविक रूप से यह शक बना रहता है कि अगर इस सप्ताहांत प्रीमियर लीग के मैच होते, तो ये खिलाड़ी मैदान पर उतरते। पाल्मर और राइस दोनों ने अपने क्लबों के लिए पूरे 90 मिनट खेले, जबकि रैशफोर्ड और मेनू ने मैनचेस्टर यूनाइटेड के लिए क्रमशः 77 और 80 मिनट खेले, और माइकल कैरिक ने साफ किया कि मेनू की वापसी पूरी तरह से रणनीतिक थी।

The Telegraph पहले ही रिपोर्ट कर चुका है कि अर्जेंटीना के खिलाफ इंग्लैंड के वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में मिली करारी हार के बाद खिलाड़ियों के भरोसे को बनाए रखने के लिए टुखेल को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उस टूर्नामेंट में अनुपस्थित पांच खिलाड़ियों में से केवल तीन ने ही हिस्सा लिया था—पाल्मर को शामिल नहीं किया गया था, मेनू ने एक मिनट भी नहीं खेला, रैशफोर्ड कभी अंदर कभी बाहर होते रहे, लिवरामेंटो चोट के कारण पहले ही हट गए थे, और राइस दर्द झेलते हुए खेले थे—ऐसे में लगभग 20% स्क्वाड का बाहर हो जाना खिलाड़ियों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना स्वाभाविक बना देता है।

सबसे अहम बात यह है कि आने वाले ये मैच महज़ औपचारिक दोस्ताना मुकाबले नहीं हैं। इंग्लैंड का सामना मौजूदा यूरोपीय और विश्व चैंपियन स्पेन से होना है, उसे चेक गणराज्य और क्रोएशिया के दौरे पर जाना है, और चेक टीम के खिलाफ घरेलू मैदान पर यूईएफए नेशंस लीग के हाई-स्टेक्स मैच खेलने हैं, जहां टुखेल को अपने कार्यकाल को वैध ठहराने के लिए नतीजों की बेहद ज़रूरत है।

यह массовी वापसी उस दौर की परेशान करने वाली यादें ताज़ा करती है, जब क्लब वफादारियां राष्ट्रीय कर्तव्य पर भारी पड़ती थीं। चाहे गैरेथ साउथगेट की रणनीतिक आलोचनाएं जितनी भी रही हों, उन्होंने क्लबों के जहरीले गुटों को तोड़ा और इंग्लैंड की जर्सी को बोझ से हटाकर एक ऐसे सम्मान में बदल दिया जिसे खिलाड़ी पहनना चाहते थे। इसके उलट, अगर मौजूदा चोटें नियंत्रित की जा सकती थीं, तो खिलाड़ियों को कैंप में भेजने या आखिरी दो मुकाबलों के लिए उन्हें तैयार रखने के बजाय पूरी तरह वापस बुला लेना साउथगेट की मेहनत से अर्जित सांस्कृतिक विरासत को नुकसान पहुंचा सकता है। जर्गन क्लॉप की जर्मनी जैसी टीमें जब तीन हफ्तों के इस कठिन कैलेंडर से निपटने के लिए बंटी हुई स्क्वाड उतार रही थीं, तब टुखेल ने उस राह को नहीं चुना—और अब उन्हें व्यापक वापसी और इस बढ़ती धारणा से जूझना पड़ रहा है कि इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व एक बार फिर प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक गया है।